पुरातात्त्विक पृष्ठभूमि

उत्तराखण्ड की भौगोलिक सीमाएँ पूर्व में पश्चिमी नेपाल, पश्चिम में यमुना की सहायक नदी टोंस, दक्षिण में तराई भावर के खटीमा टनकपुर तक तथा उत्तर में तिब्बत की सीमा तक विस्तृत हैं। पुरातात्त्विक दृष्‍टि से उत्तराखण्ड मानव सभ्यता के आदिकाल से अनवरत आबादित रहा। देहरादून जिले के कालसी से प्राप्त पाषाण उपकरण, अल्मोड़ा के लखुउड्यिार व चमोली के किमनी एवं डूंगरी से प्राप्त चित्रित शैलाश्रय, पिथौरागढ़ के बनकोट व नैनी पाताल से प्राप्त ताम्र उपकरण एवं जिला चमोली के मलारी से प्राप्त वृहत्पाषाण कालीन स्वर्ण मुखौटा तथा लटकन आदि की प्राप्ति उत्तराखण्ड में मानव सभ्यता के क्रमिक विकास की पुष्टि करती है। साहित्यिक, मुद्राशास्त्रीय एवं अभिलेखीय स्रोत इस क्षेत्र में द्वितीय शताब्दी ई0पू0 से पांचवीं शताब्दी ई0 के मध्य यहाँ के सांस्कृतिक प्रमाण प्रस्तुत करते हैं। चैथी शताब्दी ई0 में यह क्षेत्र कार्तिकेयपुर के नाम से जाना जाता था जिसका विवरण समुद्रगुप्त के इलाहाबाद प्रशस्ति अभिलेख में मिलता है।

अल्मोड़ा जिले के तालेश्वर से प्राप्त दो ताम्रपत्र अभिलेख मध्य हिमालय में छठी शताब्दी ई0 में बर्मन शासकों की सत्ता की पुष्टि करते हैं। उत्तराखण्ड ’ब्रह्मपुर’ के नाम से भी जाना जाता था, जिसका उल्लेख बराह-मिहर की बृहद-संहिता मे मिलता है। सातवीं सदी ई0 में चीनी यात्री ह्वेनसांग के यात्रा विवरण में भी ब्रहमपुर का वर्णन मिलता है। 7वीं से 12वीं सदी ई0 में उत्तराखण्ड एवं पश्चिमी नेपाल कत्यूरी वंश के शासकों द्वारा शासित रहा। अभिलेखीय प्रमाणों से ज्ञात होता है कि सन् 1199 से 1223 ई0 के मध्य पश्चिमी नेपाल के मल्ल शासकों ने इस क्षेत्र को अपने अधीन किया।

मल्ल शासकों के प्रभाव के कारण कत्यूरी शासकों की सत्ता का हृास होने लगा। अभिलेखीय प्रमाण इस तथ्य की पुष्टि करते हैं कि कालान्तर में परवर्ती कत्यूरी शासक स्वतंत्र रूप से छोटे-छोटे राजवंशों के रूप में इस क्षेत्र में शासन करते रहे। धीरे-धीरे इन छोटे राजवंशों का प्रभाव भी घटने के साथ ही इस क्षेत्र में दो नये राजवंशो का प्रार्दुभाव हुआ इनमें गढ़वाल का पंवार तथा कुमाऊँ का चन्द्र वंश प्रमुख है। कालान्तर में सन् 1734 में रोहिला शासकों ने कुमाऊँ पर अधिकार कर राजधानी अल्मोड़ा को अपने नियन्त्रण में ले लिया लेकिन तत्कालीन परिस्थितियों के कारण रोहिला केवल छह माह तक ही अल्मोड़ा में अपना अधिकार रख पाये। सन् 1791 में नेपाल के गोरखा शासकों ने कुमाऊँ तथा सन् 1804 में गढ़वाल पर अपना अधिकार स्थापित किया। सन् 1815 में अंग्रेजों द्वारा गोरखा राजा को परास्त कर सम्पूर्ण उत्तराखण्ड को ब्रिटिश साम्राज्य के अधीन कर लिया।

उक्त पुरातात्त्विक खोजों व उपलब्धियों से ज्ञात होता है कि इस क्षेत्र में प्रागैतिहासिक आद्य-एतिहासिक, महाश्म, ऐतिहासिक, परवर्ती ऐतिहासिक काल एवं मध्यकाल में सांस्कृतिक गतिविधियाँ अनवरत रूप से चलती रहीं, जो वर्तमान में भी जारी हैं।