अल्मोड़ा

जागेश्वर (जागनाथ) मन्दिर जागेश्वर, जनपद-अल्मोड़ा

asidehraduncircle.in :: kumaon(17).jpg यह मन्दिर जागेश्वर मन्दिर समूह में स्थित है इसे जागनाथ मन्दिर के नाम से भी जाना जाता है। मध्य हिमालय में कत्यूरी शासन के दौरान काफी बड़े स्तर पर मन्दिरों का निर्माण का कार्य किया गया, जागेश्वर का यह मन्दिर भी उसी समय का है।

जागेश्वर मन्दिर को स्थानीय भाषा में जागनाथ (शिव को योगेश्वर भी कहा जाता है) कहा गया है। इसके पूरब में त्रिरथ अन्तराल एवं ढालदार शिखर है जिसके आगे पिरामिडनुमा मंडप है। मन्दिर की पुरानी छत के टूटने के बाद उसको धातु की छत से बदल दिया गया। निर्माण विधि को देखते हुए यह मन्दिर आठवीं शताब्दी का प्रतीत होता है।

मृत्युंजय मन्दिर जागेश्वर जनपद-अल्मोड़ा

asidehraduncircle.in :: kumaon(18).jpg यह जागेश्वर मन्दिर समूह का एक और प्रमुख शिव मन्दिर है। पूर्वाभिमुखी यह मन्दिर जागनाथ मन्दिर के सामने की तरफ लैटिन शिखर शैली में निर्मित त्रिरथ जिसमें, अंतराल व स्तंभ का मंडप युक्त है। मंडप की पिरामिडनुमा छत पूर्व में पत्थरों द्वारा निर्मित थी, जिसको बाद में धातु की चादर से बदल दिया गया।

कुबेर मन्दिर, जागेश्वर जनपद-अल्मोडा

asidehraduncircle.in :: kumaon(16).jpg यह एक छोटा देवालय है जो कि चण्डिका मन्दिर के समीप एक ऊंचे स्थान पर निर्मित है। हालांकि यह मन्दिर आकार में छोटा है परन्तु वास्तुकला में यह मृत्यंजय मन्दिर, जागेश्वर के अनुरूप है। इसके शिखर को आमलकशिला के ऊपर आकाश लिंग से लगाया गया है।

दण्डेश्वर मन्दिर- जागेश्वर, जनपद-अल्मोड़ा

asidehraduncircle.in :: kumaon(14).jpg भगवान शिव समर्पित यह मन्दिर जागेश्वर मन्दिर समूह के निकट और प्रमुख जागेश्वर मन्दिर से पहले स्थित है। बनावट में यह मन्दिर फांसना शिखर शैली का है, लेकिन इस शैली से भिन्न इसके शिखर 3 या 4 बढ़ते क्रम में उठे हुये हैं जिनमें प्रत्येक के ऊपर एक कुंभ मोल्डिंग की गयी है। साक्ष्यों से ज्ञात होता है कि प्राचीन मन्दिर में एक गर्भगृह, जिसके बाद मंडप था, लेकिन वर्तमान में मंडप पूरी तरह विलुप्त है। यह मन्दिर 9-10वीं शताब्दी का है।

चण्डिका मन्दिर, जागेश्वर, जनपद-अल्मोड़ा

asidehraduncircle.in :: kumaon(15).jpg कुबेर मन्दिर के नीचे स्थित बलभी शिखर का यह मन्दिर देवी चण्डिका को समर्पित है। सामान्यतः इस शैली में निर्मित मंदिर देवी को समर्पित होते हैं। लम्बवत् योजना में यह मन्दिर वरण्डिका भाग तक आयातकार है जबकि शिखर भाग गजपृष्ठाकार है जो कि देवी को समर्पित मन्दिरों के वास्तु की एक प्रमुख विशेषता है। कालक्रम के अनुसार इसे आठवीं- नौवीं शताब्दी ई0 में रखा जा सकता है।

नवगृह मंदिर, जागेश्वर, जनपद-अल्मोड़ा

asidehraduncircle.in :: kumaon(21).jpg जागेश्वर मन्दिर परिसर में सूर्य मन्दिर के उत्तर में स्थित नवगृह मन्दिर किसी भी प्रकार की वास्तु शैली से अछूता है। मन्दिर के सरदल पर नव ग्रह के उकेरा हुआ दर्शाया गया है। सूर्य को उनके लम्बे जूतों में दोनों हाथ में पूरा खिला हुआ कमल का फूल पकड़े हुये दर्शाया गया है, जबकि राहु को एक मुण्ड एवं केतु को साँप की छतरी के रूप में प्रदर्शित किया गया है। शेष ग्रहों ने अपने उल्टे हाथ में पानी का कलश और उपर की तरफ उठे हुये सीधे हाथ में माला धारण किए हैं।

पिरामिडाकार मन्दिर, जागेश्वर, जनपद-अल्मोड़ा

asidehraduncircle.in :: kumaon(20).jpg जागनाथ मन्दिर के ठीक पीछे मन्दिर परिसर के भीतर दो फांसना शिखर शैली के मन्दिर हैं। प्लान एवं ऐलीवेशन में चौरस दोनों मन्दिरों के शिखर ढालदार, उभरे-धंसे हुये आकार जिसको पीड़ा कहते हैं, से निर्मित है, जिसके कारण इसे पीड़ा देवल नाम से भी पुकारा जाता है। मन्दिर में गर्भगृह एवं उससे पहले एक कपीली है।

नंदा देवी या नौ दुर्गा, जागेश्वर, जनपद-अल्मोड़ा

asidehraduncircle.in :: kumaon(19).jpg यह जागेश्वर मंदिर समूह के परिसर में वलभी शिखर श्रेणी का मंदिर देवी नंदा देवी को समर्पित है। स्थानीय लोग इसे नौ दुर्गा मंदिर कहते हैं। इसके अलावा इस समूह में तीन और ऐसे ही मंदिर हैं जो कालिका देवी, पुष्टि देवी और चंडिका देवी मंदिर हैं। यह तीनों भी वलभी शिखर श्रेणी के मन्दिर हैं।

सूर्य को समर्पित मंदिर, जागेश्वर, जनपद-अल्मोड़ा

asidehraduncircle.in :: kumaon(22).jpg यह एक सामान्य वास्तु शैली में निर्मित छोटा रेखी शिखर मंदिर है। भगवान सूर्य को समर्पित मंदिर में रथ गर्भ गृह तथा बाहर निकला हुआ आँगन हैं। गर्भ गृह में किसी देवता की मूर्ति नही है तथापि सरदल पर सूर्य का रथ सहित मूर्ति अंकित हैं जिससे यह प्रतीत होता हैं की यह मंदिर सूर्य उपासना में प्रयुक्त होता था। यह मंदिर 14वीं शताब्दी ई0 का प्रतीत होता हैं।

सूर्य मंदिर, कटारमल, जनपद-अल्मोड़ा

asidehraduncircle.in :: kumaon(13).jpg यह मंदिर बड़ादित्य अथवा सूर्य का बड़ा मंदिर के नाम से जाना जाता है। यह मंदिर इस क्षेत्र के सबसे ऊँचे मंदिरों में हैं। मुख्य मंदिर के अलावा पहाड़ की ढलान पर चबूतरे पर अन्य लघु देवालए भी हैं जिन पर पूर्व दिशा में स्थित सीढि़यों से प्रवेश किया जाता है। पूर्वाभिमुखी मुख्य मन्दिर में त्रि-रथ गर्भगृह है। बाद में इसमें एक मंडप से जोड़ा गया है। यहाँ का काष्ठ निर्मित अलंकृत दरवाजा वर्तमान में राष्ट्रीय संग्रहालय, नई दिल्ली में प्रदर्शित है। स्थल से प्राप्त पकी ईंटों के खण्डों की प्राप्ति से प्रतीत होता है कि प्रारम्भ में यह मन्दिर ईंटों और लकड़ी से बना था जिसे कालांतर में (12वीं-13वीं शताब्दी) में वर्तमान के पत्थरों से निर्मित किया गया। यहां उपलब्ध अन्य लघु देवालय इस तथ्य की पुष्टि करते हैं कि कटारमल में इसके बाद भी निर्माण कार्य किये गये। गर्भगृह में अनेक हिन्दू देवी-देवताओं की पत्थर की मूर्तियां हैं। सूर्य की पत्थर की मूर्ति के अलावा लकड़ी की भी जीर्ण-शीर्ण अवस्था की मूर्ति हैं जिससे अनुमान लगता है कि वर्तमान मन्दिर से पहले भी यहां पूजा होती थी। पूर्वाभिमुखी मुख्य मन्दिर में त्रि-रथ गर्भगृह है। बाद में इसमें एक मंडप जोड़ा गया है।

बद्रीनाथ मन्दिर समूह द्वाराहाट जनपद-अल्मोड़ा

asidehraduncircle.in :: kumaon(5).jpg यह समूह तीन मन्दिरों को मिलाकर बना है, जिनमें प्रमुख मन्दिर भगवान विष्णु को समर्पित है जिनकी यहां पर बद्रीनाथ के रूप में पूजा होती है। गर्भगृह, अंतराल एवं मण्डप युक्त पूर्वाभिमुखी यह मन्दिर में वर्तमान में मंडप विहीन है। सामने से कुंभ-कलश और कपोट पटिका एवं उसके ऊपर शिखर दिखायी देता है। शिखर में भूमि आमलक और कलश है। यहां स्थित काले पत्थर की विष्णु की मूर्ति (जिस पर सम्वत 1105 अंकित है) की पूजा होती है। प्राप्त साक्ष्यों के आधार पर मन्दिर निर्माण सन् 1048 शताब्दी ई0 निर्धारित की गई है। परिसर में दो और लघु देवालय भी हैं जिनमें एक देवी लक्ष्मी को समर्पित है तथा दूसरा मूर्ति विहीन है।

वनदेव मन्दिर, द्वाराहाट, जनपद-अल्मोड़ा

asidehraduncircle.in :: kumaon(12).jpg स्थानीय नदी खीर गंगा के तट पर निर्मित यह मन्दिर मध्य हिमालय के प्राचीन विकसित फांसना शैली के मन्दिरों में से एक है। क्षैतिज योजना में आयाताकार इस मन्दिर का शिखर भाग क्रमशः घटते हुए क्रम में ऊपर की ओर बढ़ता है जिसे पीड़ा देवल शैली के नाम से भी जाना जाता है।

गुर्जर देव मन्दिर द्वाराहाट जनपद-अल्मोड़ा

asidehraduncircle.in :: kumaon(7).jpg 13वीं शताब्दी ई0 में निर्मित यह मन्दिर मध्य हिमालय में नागर शैली मन्दिरों का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। पंचायतन शैली में निर्मित यह मन्दिर एक ऊंचे चबूतरे पर स्थित है जिसका अधिष्ठान एवं जंघा भाग देव प्रतिमाओं, नर्तकों एवं पशु प्रतिमाओं से अलंकृत है। इस मन्दिर के स्थापत्य व ध्वसांवशेषों से ज्ञात होता है कि यह अत्यन्त भव्य मन्दिर था।

कचहरी मन्दिर समूह, द्वाराहाट, जनपद-अल्मोड़ा

asidehraduncircle.in :: kumaon(8).jpg इस मन्दिर समूह में कुल 12 छोटे-बड़े मन्दिर हैं जिनका निर्माण 11-13वीं शताब्दी ई0 के मध्य हुआ। यह सभी मन्दिर नागर शैली में निर्मित हैं जो गर्भगृह, अन्तराल तथा अर्धमण्डप युक्त हैं। वर्तमान में सभी मन्दिर प्रतिमा विहीन हैं।

कुटुम्बरी मन्दिर द्वाराहाट, जनपद -अल्मोड़ा

वर्तमान में यह मन्दिर अस्तित्व में नहीं है। यह मन्दिर पहाड़ की ऊंची ढलान पर स्थित था जो वर्तमान में पूरी तरह से समाप्त हो चुका है परन्तु मन्दिर के वास्तु संरचनाओं के अवशेष निकटवर्ती घरों में किए गये निर्माणों में यदा-कदा दृष्टिगोचर होते हैं। देहरादून मण्डल द्वारा सन् 2000 में किए गए एक विस्तृत सर्वेक्षण से ज्ञात हुआ कि सन् 1960 तक कुतुम्बरी मन्दिर अस्तित्व में था। प्राप्त पुराने छाया चित्र से ज्ञात हुआ कि यहां पर रेखा शिखर शैली का अति जीर्ण-शीर्ण अवस्था का मन्दिर था, जो कि सन् 1960 के पश्चात घ्वस्त हो गया। सम्भवतः वास्तु के नमूने गांव वालों द्वारा अपने निर्माण के उपयोग के लिये ले जाये गये ।

मनियान मन्दिर समूह, द्वाराहाट, जनपद-अल्मोड़ा

asidehraduncircle.in :: kumaon(10).jpg पूर्व में यह सात मन्दिरों का समूह था लेकिन कुछ समय पूर्व विभाग द्वारा करायी गयी वैज्ञानिक सफाई के फलस्वरूप दो अन्य मन्दिरों के अवशेष प्रकाश में आये हैं, इस प्रकार यह 9 मन्दिरों का समूह है। इनमें से चार मन्दिर ऐसे निर्मित हैं कि वो चारों मिलकर एक जुड़ा हुआ दृश्य प्रस्तुत करते हैं जिसके आगे एक प्रांगण है। तीन देवालयों के सरदल पर जैन तीर्थकारों की मूर्तियां इस बात की ओर इंगित करती हैं कि यह मन्दिर जैन धर्म से सम्बन्धित है जो सामान्यतः इस क्षेत्र में नहीं पाये जाते हैं, शेष देवालय हिन्दू देवी-देवताओं को समर्पित हैं। यह मन्दिर समूह लगभग 11-12वीं शताब्दी ई0 में निर्मित हुआ।

मृत्युजंय मन्दिर समूह, द्वाराहाट, जनपद-अल्मोड़ा

asidehraduncircle.in :: kumaon(9).jpg प्रमुख मन्दिर भगवान शिव-मृत्युजंय (मृत्यु पर विजय पाने वाला) को समर्पित है। नागर शिखर शैली में निर्मित पूर्वाभिमुखी यह मन्दिर त्रि-रथ योजना में निर्मित है, जिसमें गर्भगृह, अंतराल और मंडप युक्त है। कालक्रम के अनुसार यह मन्दिर 11-12वीं शताब्दी का है। मन्दिर परिसर में स्थित दो अन्य मन्दिर जो क्रमशः भैरव को समर्पित है दूसरा लघु देवालय जीर्ण-शीर्ण अवस्था है।

रतनदेव मन्दिर समूह, द्वाराहाट, जनपद-अल्मोड़ा

asidehraduncircle.in :: kumaon(11).jpg प्रारम्भ में रतनदेव मन्दिर नौ मन्दिरों का समूह था। वर्तमान में सिर्फ 6 मन्दिर बचे हैं इनमें से तीन मन्दिर एक सामूहिक चबूतरे पर स्थित हैं जिनके आगे उत्तरमुखी मंडप है जो सम्भवत् ब्रह्मा, विष्णु एवं महेश को समर्पित थे। अन्य देवालयों में एक पश्चिम तथा दो पूरब में एक दूसरे को मुख करके अन्य हिन्दू देवी-देवताओं को समर्पित हैं। यह मन्दिर 11-13वीं शताब्दी में निर्मित किए गये।